जब भी सोंचती हूँ
अब मेँ चूप रहूंगी ,
तब
मन की चंचलता हिलोले ल्रती है
आदतों का बचपना पुकारने लगता है
आशाओं का स्वप्न संवरने लगता है
भावनाओं का ज्वार उफनने लगता है
आखों का जल छलकने लगता है
और तब ,
ना चाहते हुए भी
एक कंपकंपातीआवाज
निकल जाती है
और मै फिर बोलने लगती हूँ
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