Thursday, February 4, 2010

जब्त होते सपने कहानी

>डॉ. स्वाति तिवारी
यूं तो मैं अवकाश पर कम ही जाती हूं पर इस बार मलेरिया के बुखार ने ऐसा जकड़ा कि पूरे बीस दिन छुट्टी पर रहना पड़ा था। लम्बे अवकाश के बाद जब मैं अपने कार्यालय पहुंची तो होस्टल के गेट पर ड्यूटी दे रही कमलाबाई ने आकर कहा-''मैडम, सुमन की मम्मी आपसे मिलना चाहती हैं।''
कमजोरी की हालत और घर से दूर छात्रावास तक पहुंचने की थकान थी मैं थोड़ा रिलेक्स मूड में आना चाह रही थी लगा, आंखें मूंदकर कुछ देर सुस्ता लिया जाए यही सोचते हुए मैंने कमलाबाई से कहा- '' थोड़ी देर बाद भेजना।'
कमलाबाई जी मैडम कहकर फिर स्कूल के गेट पर बैठ गई।
इन बीस दिनों में कागजों का अम्बार लगा था। टेबल पर ढेर सारी जानकारियां भी भेजना थी हेड ऑफिस। काम का ढेर देख मैं मलेरिया को कोसने लगी, न बीमार होती न काम बढ़ता।
जब-जब भी पैंडिंग काम देखती हूं दिमाग खराब होने लगता है चिढ़ आने लगती नौकरी पर। तनाव के कारण कई बार तो माइग्रेन का दर्द अचानक झटके के साथ उठने लगता है। पर काम तो करना ही है वरना दो-चार दिनों में फिर यही काम चार गुना हो जाएगा और फिर करना तो मुझे ही था यही सोच इच्छा न होने पर फटाफट कागज निपटाने लगी।
कई बार होस्टल वार्डन होना अच्छा भी लगता था। एक तरह इतनी सारी लड़कियों की मां का रोल अदा करना पड़ता था, कुछ रिश्ते यूं ही अनायास बहुत ही आत्मिक हो जाते है। बरसों बाद भी जब वे कायम रहते हैं तो लगता है मैं सफल वार्डन हूं और कई बार इतनी परेशान हो जाती हूं कि लगता था नौकरी छोड़ ही दूं। वही रूटीन, रोज एक नई समस्या, आऊटिंग का झंझट, लोकल गार्जीयन, बीमारी, मेस, आज बिजली तो कल पानी कुछ न कुछ चलता ही रहता है।
छात्रावास का संचालन कोई आसान काम नहीं है।
दो बच्चों की गृहस्थी चलाने में लोगों को भाव आ जाते हैं तो फिर यह तो दो सौ बच्चों का कुटुम्ब है इसे चलाना टेढ़ी खीर ही है। फिर शहर का माहौल युवा बेटियों की मां अपनी एक बेटी को लेकर चिंता करती है, यहां तो अलग-अलग वातावरण की लड़कियों को संभालना है, कब कौन बखेड़ा खड़ा कर दे कहा नहीं जा सकता। हर 'वार्डन' इतनी चौकस रहने लगती है कि कई बार वे जेलर की तरह लगने लगती है। हर कागज को संभालना हर रजिस्टर को कम्पलीट करना एक आदत बन गई है।
आवेदनों को फाईल करते वक्त मैं भूल गई कि सुमन की मम्मी मुझसे मिलना चाहती हैं। अचानक मेरे हाथ सुमन का आवेदन आ गया। पढ़कर मैं स्तब्ध रह गई थी। जिंदगी इतनी क्षण भंगुर क्यों है? पानी पर उठे बुलबुले की तरह। पलक झपकते जो खत्म भी हो जाती है। ईश्वर ने जीवन का मापदंड हर व्यक्ति के लिए छोटा बड़ा क्यों कर डाला है? जीवन की इसी अस्थिरता ने मुझे हमेशा डराया है। मैं बड़े से बड़ा संकट झेल लेती हूं पर मृत्यु, चाहे वह किसी की भी हो, मुझे विचलित कर देती है। सुमन के पिता नहीं रहे यही उल्लेख था कागज पर। पर मैं इस सच्चाई पर विश्वास ही नहीं कर पा रही थी। कुछ दिन पहले ही मुझसे मिल कर गए थे ढेर सा विश्वास और आस्था दर्शायी थी मुझमें कहने लगे थे-''मैडम आप के पास सुमन है, मैं तो समझो बेफिक्र हो गया। सुमन आपकी इतनी प्रशंसक है जब भी घर आती है बस हमारी मैडम ने ये कहा, ऐसा किया इसी पर चहकती रहती है।''
तब मैंने भी तो उनकी बेटी पर विश्वास प्रकट करते हुए कहा था-''वर्माजी 'सुमन' में प्रतिभा है, लगन है, वह जरूर आपकी इच्छा अनुसार पढ़-लिख कर आपका नाम रोशन करेगी, मुझे विश्वास है।''
बहुत पुरानी घटना नहीं है अभी 25 दिन पहले ही वो अपनी लाड़ली से मिलने आए थे। कई बार बता चुके हैं सुमन उनकी सबसे बड़ी और शायद सबसे ज्यादा लाड़ली थी।
अक्सर वह मेरे ऑफिस में मेरे काम में हाथ बँटाती थी। होस्टल में तो ऐसा होता ही है, लड़कियों को जब भी घर की याद आती है वे मेरे पास आकर बातें करने लगती हैं। मेरे साथ लाइब्रेरी का या कोई दूसरे काम में लग जाती हैं। इसी दौरान जो बातें होती हैं वही हमारे मध्य भावनात्मक सेतु में बदल जाती हैं। फिर मेरा रोल अभिभावक का हो जाता है।
सुमन तो यूं भी मेरी ज्यादा ही विश्वासपात्र हो गई थी। अक्सर मेरे साथ किताबें जमाते वक्त बातें करती रही थी।
मेरे पापा एकसा कहते हैं, मेरे पापा चाहते हैं मैं सबसे ज्यादा पढ़ सकूं। मैडम मेरे पापा की इच्छा है मैं बहुत बड़ी ऑफीसर बनूं, वो कहते हैं उन्होंने तमाम उम्र नौकरी की है पर वह गुलामी की नौकरी है। उनकी इच्छा है कि उनकी बेटी को ऐसी नौकरी न करनी पड़े, मैं खुद बड़ी अधिकारी या डॉक्टर बनूं इसलिए तो यहां इतनी दूर आपके पास पढ़ने भेजा है।
मैंने हजारों बार एक पिता के सपनों को सुमन की आंखों में तैरते देखा था। उन आंखों में तैरती सपनों की छोटी-छोटी किश्तियां, उसके माता-पिता की छोटी-छोटी इच्छाएं थीं।
चांद-तारों को छूने की छोटी सी आशा सुमन बनकर उनके जीवन में आई है। सुमन की बातों से लगता था वह एक ऐसी जादू की गुड़िया बन जाए तो उसके पिता के हर अधूरे सपनों को साकार कर सके।
भाग्य का लिखा कौन मिटा सकता है? हजारों सपनों से भरी आंखें अचानक बंद हो जाएं तो उन आंखों में देखकर सपने पालने वाली सुमन की पीड़ा मेरे रोंगटे खड़े कर रही थी। सुमन तो खुद पिता का सपना रही है पर अधूरा ही। विधाता के खेल अजब निराले हैं। पासा कब पलट जाएगा, कहना मुश्किल है। नाव किनारे से पहले कब डूब जाए क्या पता?
मेरी तन्द्रा भंग हुई कमलाबाई की आवाज से।
मैडम। सुमन की मम्मी............................ओह। हां भेज दो, कहकर मैं खुद हिम्मत जुटाने लगी थी उनसे मिलने की।
जब-जब भी सुमन को होस्टल छोड़ने मम्मी-पापा साथ आते थे, सुमन चंचल और इतनी खुश लगती थी मानो खुशियों का खजाना लूटकर आ रही है। उससे खुशियों की यह लूट संभाले नहीं संभलती थी।
होस्टल की लाईफ ही ऐसी है जब भी कोई प्रियजन मिलने आते हैं लड़कियों के प्रफुल्लित चेहरे कहते हैं कितना सुख है रिश्तों में, कितनी आस्था है हमारी परिवार में।
दरवाजे पर फिर आहट हुई। मैंने जैसे ही दरवाजे पर नजर डाली, सफेद साड़ी में लिपटी उस सूरत को देखकर आंखों के कोर गीले हो गए थे आवाज साथ देना नहीं चाहती थी बड़ी मुश्किल से आइए बैठिए प्लीज कहकर मैं उस सूरत को पहचानना चाह रही थी। जब भी वह स्त्री अपने पति के साथ बेटी से मिलने आती थी तो रंगीन कपड़ों में जीवन के रंग लिए होती थी। हाथ भर चटक रंगों वाली चूड़ियां, माथे पर लाल दमकती बिंदिया और मांग में दमकता सिंदूर उसके सुखी दाम्पत्य को दर्शाता था। सुरक्षात्मक भाव ही उसके चेहरे की कांति थी। उसे उसी रूप में देखने की आदी मेरी आंखें सफेद साड़ी में लिपटी बगैर श्रृंगार के देख ही नहीं पा रही थी मुस्कान लिए वह सुहागन चेहरा आज निर्वासन की उदासी लिए था और सूनी कलाई वाले हाथ जीवन के सूनेपन को दर्शा रहे थे मन विचलित, भारी और भावुक हो रहा था औरत के जीवन के सवरूप को देखकर लगा सुहागन स्त्री की और विधवा स्त्री की मूर्ति में इतना अन्तर क्यों? क्यों यह परम्परा का ढकोसला? एक औरत जिस पर आफतों का पहाड़ टूट पड़ा है, उसे यह रूप दे समाज क्या चाहता है? क्या वह शेष उम्र अपने आप को सारी दुनिया से अभागन रूप में अलग कर, केवल जीवन के इस हादसे से ही जुड़ी रहे? यह कैसी हमारी सामाजिक व्यवस्था है? हम विधवा को इस तरह क्यों बना देते हैं? समाज के सामने उसके विधवा और असुरक्षित होने का एक सर्टिफिकेट क्यों जड़ देते हैं उसके रूप पर? यह अनचाही परम्परा पुरूषों पर तो लागू नहीं है?
सुमन की मम्मी उसे होस्टल से हमेशा के लिए ले जाना चाहती थी क्योंकि सुमन को उसके पिता की जगह नौकरी मिल गई थी वही जी हुजूरी की। मैंने उसकी मम्मी को समझाया उसे पढ़ने दो, इसमें लगन है, प्रतिभा है। यह तीन साल बाद तुम्हारे लिए तुम्हारे पति का स्वप्न साकार कर सकती है इसके पिता इसे पढ़ाना चाहते थे।
सुमन की मां फूट-फूट कर रोने लगी थी। उसके दर्द को शब्दों में बयान नहीं कर सकती वह कहना चाह रही थी ''पढ़ाना तो मैं भी चाहती थी पर पांच भाई बहनों के पालन-पोषण, बूढ़ी हो गई दादी की दवा, भाई के पढ़ने का खर्च कैसे चलेगा अगर मैं वहां नौकरी करूँगी तो जो थोड़ा रूपया मेरी मजदूरी और खेती से आता है वह बंद हो जाएगा, फिर खाने के भी लाले पड़ने लगेंगे। इसलिए आप तो उसे छुट्टी दे दो।''
मैंने आवेदन पर दस्तखत किए और पेन डस्टबिन में फेंक दिया था शायद वह पेन मनहूस हो। बाहर देखा तो गेट पर एक मुरझााई मरी-मरी सी सुमन खड़ी थी जिसके चेहरे पर न रौनक थी-न आंखों में कोई सपना। वे आंखें निर्विकार थीं जो छूटते होस्टल को घूर रही थी। मुझे लगा अब उन आंखों में फिर कभी कोई सपना नहीं उगेगा वे आंखें बंजर हो गई हैं नियति के चक्र में शायद सपनों का कब्रिस्तान, क्योंकि अपने सपनों को दफनाकर अब सुमन कमाएगी और छोटे भाई बहन बड़े होते जाएंगे और सुमन क्षण-क्षण घटती जाएगी। ाायद सपनों का कब्रिस्तान, क्योंकि अपने सपनों को दफनाकर अब सुमन कमाएगी और छोटे भाई बहन बड़े होते जाएंगे और सुमन क्षण-क्षण घटती जाएगी।
फिर एक दिन वे नन्हें चूजे, पंख पसार अपना नया आकाश तलाशेंगे नया घोंसला बना डालेंगे रह जाएगी अकेली सुमन पिता की यादों को समेटे बूढ़ी मां को संभालती फिर एक दिन खुद खो जाएगी या फिर असमय चली जाएगी पिता के पास अपने कर्तव्य को पूरा कर देने की सूचना देने।





1 comment:

  1. "अपने सपनों को दफनाकर अब सुमन कमाएगी और छोटे भाई बहन बड़े होते जाएंगे और सुमन क्षण-क्षण घटती जाएगी"

    प्रशंसनीय प्रस्तुति - आभार

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