Thursday, February 4, 2010

जब्त होते सपने कहानी

>डॉ. स्वाति तिवारी
यूं तो मैं अवकाश पर कम ही जाती हूं पर इस बार मलेरिया के बुखार ने ऐसा जकड़ा कि पूरे बीस दिन छुट्टी पर रहना पड़ा था। लम्बे अवकाश के बाद जब मैं अपने कार्यालय पहुंची तो होस्टल के गेट पर ड्यूटी दे रही कमलाबाई ने आकर कहा-''मैडम, सुमन की मम्मी आपसे मिलना चाहती हैं।''
कमजोरी की हालत और घर से दूर छात्रावास तक पहुंचने की थकान थी मैं थोड़ा रिलेक्स मूड में आना चाह रही थी लगा, आंखें मूंदकर कुछ देर सुस्ता लिया जाए यही सोचते हुए मैंने कमलाबाई से कहा- '' थोड़ी देर बाद भेजना।'
कमलाबाई जी मैडम कहकर फिर स्कूल के गेट पर बैठ गई।
इन बीस दिनों में कागजों का अम्बार लगा था। टेबल पर ढेर सारी जानकारियां भी भेजना थी हेड ऑफिस। काम का ढेर देख मैं मलेरिया को कोसने लगी, न बीमार होती न काम बढ़ता।
जब-जब भी पैंडिंग काम देखती हूं दिमाग खराब होने लगता है चिढ़ आने लगती नौकरी पर। तनाव के कारण कई बार तो माइग्रेन का दर्द अचानक झटके के साथ उठने लगता है। पर काम तो करना ही है वरना दो-चार दिनों में फिर यही काम चार गुना हो जाएगा और फिर करना तो मुझे ही था यही सोच इच्छा न होने पर फटाफट कागज निपटाने लगी।
कई बार होस्टल वार्डन होना अच्छा भी लगता था। एक तरह इतनी सारी लड़कियों की मां का रोल अदा करना पड़ता था, कुछ रिश्ते यूं ही अनायास बहुत ही आत्मिक हो जाते है। बरसों बाद भी जब वे कायम रहते हैं तो लगता है मैं सफल वार्डन हूं और कई बार इतनी परेशान हो जाती हूं कि लगता था नौकरी छोड़ ही दूं। वही रूटीन, रोज एक नई समस्या, आऊटिंग का झंझट, लोकल गार्जीयन, बीमारी, मेस, आज बिजली तो कल पानी कुछ न कुछ चलता ही रहता है।
छात्रावास का संचालन कोई आसान काम नहीं है।
दो बच्चों की गृहस्थी चलाने में लोगों को भाव आ जाते हैं तो फिर यह तो दो सौ बच्चों का कुटुम्ब है इसे चलाना टेढ़ी खीर ही है। फिर शहर का माहौल युवा बेटियों की मां अपनी एक बेटी को लेकर चिंता करती है, यहां तो अलग-अलग वातावरण की लड़कियों को संभालना है, कब कौन बखेड़ा खड़ा कर दे कहा नहीं जा सकता। हर 'वार्डन' इतनी चौकस रहने लगती है कि कई बार वे जेलर की तरह लगने लगती है। हर कागज को संभालना हर रजिस्टर को कम्पलीट करना एक आदत बन गई है।
आवेदनों को फाईल करते वक्त मैं भूल गई कि सुमन की मम्मी मुझसे मिलना चाहती हैं। अचानक मेरे हाथ सुमन का आवेदन आ गया। पढ़कर मैं स्तब्ध रह गई थी। जिंदगी इतनी क्षण भंगुर क्यों है? पानी पर उठे बुलबुले की तरह। पलक झपकते जो खत्म भी हो जाती है। ईश्वर ने जीवन का मापदंड हर व्यक्ति के लिए छोटा बड़ा क्यों कर डाला है? जीवन की इसी अस्थिरता ने मुझे हमेशा डराया है। मैं बड़े से बड़ा संकट झेल लेती हूं पर मृत्यु, चाहे वह किसी की भी हो, मुझे विचलित कर देती है। सुमन के पिता नहीं रहे यही उल्लेख था कागज पर। पर मैं इस सच्चाई पर विश्वास ही नहीं कर पा रही थी। कुछ दिन पहले ही मुझसे मिल कर गए थे ढेर सा विश्वास और आस्था दर्शायी थी मुझमें कहने लगे थे-''मैडम आप के पास सुमन है, मैं तो समझो बेफिक्र हो गया। सुमन आपकी इतनी प्रशंसक है जब भी घर आती है बस हमारी मैडम ने ये कहा, ऐसा किया इसी पर चहकती रहती है।''
तब मैंने भी तो उनकी बेटी पर विश्वास प्रकट करते हुए कहा था-''वर्माजी 'सुमन' में प्रतिभा है, लगन है, वह जरूर आपकी इच्छा अनुसार पढ़-लिख कर आपका नाम रोशन करेगी, मुझे विश्वास है।''
बहुत पुरानी घटना नहीं है अभी 25 दिन पहले ही वो अपनी लाड़ली से मिलने आए थे। कई बार बता चुके हैं सुमन उनकी सबसे बड़ी और शायद सबसे ज्यादा लाड़ली थी।
अक्सर वह मेरे ऑफिस में मेरे काम में हाथ बँटाती थी। होस्टल में तो ऐसा होता ही है, लड़कियों को जब भी घर की याद आती है वे मेरे पास आकर बातें करने लगती हैं। मेरे साथ लाइब्रेरी का या कोई दूसरे काम में लग जाती हैं। इसी दौरान जो बातें होती हैं वही हमारे मध्य भावनात्मक सेतु में बदल जाती हैं। फिर मेरा रोल अभिभावक का हो जाता है।
सुमन तो यूं भी मेरी ज्यादा ही विश्वासपात्र हो गई थी। अक्सर मेरे साथ किताबें जमाते वक्त बातें करती रही थी।
मेरे पापा एकसा कहते हैं, मेरे पापा चाहते हैं मैं सबसे ज्यादा पढ़ सकूं। मैडम मेरे पापा की इच्छा है मैं बहुत बड़ी ऑफीसर बनूं, वो कहते हैं उन्होंने तमाम उम्र नौकरी की है पर वह गुलामी की नौकरी है। उनकी इच्छा है कि उनकी बेटी को ऐसी नौकरी न करनी पड़े, मैं खुद बड़ी अधिकारी या डॉक्टर बनूं इसलिए तो यहां इतनी दूर आपके पास पढ़ने भेजा है।
मैंने हजारों बार एक पिता के सपनों को सुमन की आंखों में तैरते देखा था। उन आंखों में तैरती सपनों की छोटी-छोटी किश्तियां, उसके माता-पिता की छोटी-छोटी इच्छाएं थीं।
चांद-तारों को छूने की छोटी सी आशा सुमन बनकर उनके जीवन में आई है। सुमन की बातों से लगता था वह एक ऐसी जादू की गुड़िया बन जाए तो उसके पिता के हर अधूरे सपनों को साकार कर सके।
भाग्य का लिखा कौन मिटा सकता है? हजारों सपनों से भरी आंखें अचानक बंद हो जाएं तो उन आंखों में देखकर सपने पालने वाली सुमन की पीड़ा मेरे रोंगटे खड़े कर रही थी। सुमन तो खुद पिता का सपना रही है पर अधूरा ही। विधाता के खेल अजब निराले हैं। पासा कब पलट जाएगा, कहना मुश्किल है। नाव किनारे से पहले कब डूब जाए क्या पता?
मेरी तन्द्रा भंग हुई कमलाबाई की आवाज से।
मैडम। सुमन की मम्मी............................ओह। हां भेज दो, कहकर मैं खुद हिम्मत जुटाने लगी थी उनसे मिलने की।
जब-जब भी सुमन को होस्टल छोड़ने मम्मी-पापा साथ आते थे, सुमन चंचल और इतनी खुश लगती थी मानो खुशियों का खजाना लूटकर आ रही है। उससे खुशियों की यह लूट संभाले नहीं संभलती थी।
होस्टल की लाईफ ही ऐसी है जब भी कोई प्रियजन मिलने आते हैं लड़कियों के प्रफुल्लित चेहरे कहते हैं कितना सुख है रिश्तों में, कितनी आस्था है हमारी परिवार में।
दरवाजे पर फिर आहट हुई। मैंने जैसे ही दरवाजे पर नजर डाली, सफेद साड़ी में लिपटी उस सूरत को देखकर आंखों के कोर गीले हो गए थे आवाज साथ देना नहीं चाहती थी बड़ी मुश्किल से आइए बैठिए प्लीज कहकर मैं उस सूरत को पहचानना चाह रही थी। जब भी वह स्त्री अपने पति के साथ बेटी से मिलने आती थी तो रंगीन कपड़ों में जीवन के रंग लिए होती थी। हाथ भर चटक रंगों वाली चूड़ियां, माथे पर लाल दमकती बिंदिया और मांग में दमकता सिंदूर उसके सुखी दाम्पत्य को दर्शाता था। सुरक्षात्मक भाव ही उसके चेहरे की कांति थी। उसे उसी रूप में देखने की आदी मेरी आंखें सफेद साड़ी में लिपटी बगैर श्रृंगार के देख ही नहीं पा रही थी मुस्कान लिए वह सुहागन चेहरा आज निर्वासन की उदासी लिए था और सूनी कलाई वाले हाथ जीवन के सूनेपन को दर्शा रहे थे मन विचलित, भारी और भावुक हो रहा था औरत के जीवन के सवरूप को देखकर लगा सुहागन स्त्री की और विधवा स्त्री की मूर्ति में इतना अन्तर क्यों? क्यों यह परम्परा का ढकोसला? एक औरत जिस पर आफतों का पहाड़ टूट पड़ा है, उसे यह रूप दे समाज क्या चाहता है? क्या वह शेष उम्र अपने आप को सारी दुनिया से अभागन रूप में अलग कर, केवल जीवन के इस हादसे से ही जुड़ी रहे? यह कैसी हमारी सामाजिक व्यवस्था है? हम विधवा को इस तरह क्यों बना देते हैं? समाज के सामने उसके विधवा और असुरक्षित होने का एक सर्टिफिकेट क्यों जड़ देते हैं उसके रूप पर? यह अनचाही परम्परा पुरूषों पर तो लागू नहीं है?
सुमन की मम्मी उसे होस्टल से हमेशा के लिए ले जाना चाहती थी क्योंकि सुमन को उसके पिता की जगह नौकरी मिल गई थी वही जी हुजूरी की। मैंने उसकी मम्मी को समझाया उसे पढ़ने दो, इसमें लगन है, प्रतिभा है। यह तीन साल बाद तुम्हारे लिए तुम्हारे पति का स्वप्न साकार कर सकती है इसके पिता इसे पढ़ाना चाहते थे।
सुमन की मां फूट-फूट कर रोने लगी थी। उसके दर्द को शब्दों में बयान नहीं कर सकती वह कहना चाह रही थी ''पढ़ाना तो मैं भी चाहती थी पर पांच भाई बहनों के पालन-पोषण, बूढ़ी हो गई दादी की दवा, भाई के पढ़ने का खर्च कैसे चलेगा अगर मैं वहां नौकरी करूँगी तो जो थोड़ा रूपया मेरी मजदूरी और खेती से आता है वह बंद हो जाएगा, फिर खाने के भी लाले पड़ने लगेंगे। इसलिए आप तो उसे छुट्टी दे दो।''
मैंने आवेदन पर दस्तखत किए और पेन डस्टबिन में फेंक दिया था शायद वह पेन मनहूस हो। बाहर देखा तो गेट पर एक मुरझााई मरी-मरी सी सुमन खड़ी थी जिसके चेहरे पर न रौनक थी-न आंखों में कोई सपना। वे आंखें निर्विकार थीं जो छूटते होस्टल को घूर रही थी। मुझे लगा अब उन आंखों में फिर कभी कोई सपना नहीं उगेगा वे आंखें बंजर हो गई हैं नियति के चक्र में शायद सपनों का कब्रिस्तान, क्योंकि अपने सपनों को दफनाकर अब सुमन कमाएगी और छोटे भाई बहन बड़े होते जाएंगे और सुमन क्षण-क्षण घटती जाएगी। ाायद सपनों का कब्रिस्तान, क्योंकि अपने सपनों को दफनाकर अब सुमन कमाएगी और छोटे भाई बहन बड़े होते जाएंगे और सुमन क्षण-क्षण घटती जाएगी।
फिर एक दिन वे नन्हें चूजे, पंख पसार अपना नया आकाश तलाशेंगे नया घोंसला बना डालेंगे रह जाएगी अकेली सुमन पिता की यादों को समेटे बूढ़ी मां को संभालती फिर एक दिन खुद खो जाएगी या फिर असमय चली जाएगी पिता के पास अपने कर्तव्य को पूरा कर देने की सूचना देने।





Wednesday, February 3, 2010

अचार (कहानी)

स्वाति तिवारी
मई की तेज धूप को देखकर याद आया कि चने की दल को धूप दिखाना है । ऑगन की धूप में पुरानी चादर बिछाकर स्टोर रूप में चले की दाल की कोठी निकालने गयी तो अचार का मर्तबान (बरनी) दिखाई दे गयी । दाल को धूप में फैलाकर पलटी तो अचार का ख्याल आया, लगे हाथ अचार को भी देख लूं । बर्नी पर कुछ नमक छिटक आया था उजाले में लाकर देखा तो यह दो साल पुराना अचार था । अम्मा कहती है - ‘पुराना अचार अचार नहीं औषधि हो जाता है - जब जी मचलाए, भूख ना लगे, स्वाद उतर जाए तो थोड़ा सा पुराना अचार चाट लो और चीर को चुस लो, सारा अजीर्ण खत्म ।‘ बात-बात में आजकल मुझे अम्मा के फंडे याद आ जाते हैं । शायद आजकल मैं बिलकुल अम्मा जैसी होती जा रही हूँ । उम्र का एक दौर ऐसा भी आता है जब हम ‘हम‘ नहीं रहते अपने माता या पिता की तरह लगने लगते हैं, वैसा ही सोचने लगते हैं । छोटी थी तो मैं हमेशा कहती थी ‘अम्मा मैं तुम्हारी तरह नहीं बनूँगी । सारा दिन बेवजह के कामों में खटती रहती हो ।‘ पर चने की दाल पर हाथ फेरते हुए मुझे अपने ही ख्याल पर हंसी आ गयी । अचार को भी परात में फैलाकर धूप में रख आयी । सोचा, इस बार अचार नहीं डालूंगी । घर में दो ही तो प्राणी बचे हैं, पति और मैं । जब तक बच्चे थे तो घर में हर तरह के अचार-मुरब्बे उठ जाते थे, पर बच्चे बाहर चले गए और हम दोनों को ही हाई ब्लड प्रेशर है । रही कसर डॉक्टर ने इनके सामने बोल कर पूरी कर दी है कि ‘भाभीजी जरा अचार-पापड़ भी कम ही खाना आपका ब्लड प्रेशर भाई साहब से ज्यादा है ।‘ बस तभी से हमारे ये लकीर के फकीर थाली में तो दूर, टेबल पर भी अचार नहीं निकालने देते । कहते हैं ‘टेबल पर रखा कि तुम थोड़ा सा के चक्कर में ले ही लोगी ।‘ और बस अब घर में अचार-पापड़ की खपत ही समझो बन्द हो गयी है । गाहे-बगाहे मेहमानों को सर्व करने या ट्रेन के टिफिन में अचार की वेल्यू बनी हुई है । हॉ हमारा माली जरुर एक दो दिन में अचार की फरमाईश कर लेता है, दे देती हूँ पता नहीं सुबह से आता है साग-सब्जी हो ना हो सोचकर ।धूप में सूखते अचार को देखकर पति महोदय ने टोका ‘अब अगर अचार भी कपड़ों की तरह धूप में सुखाना पड़ता है तो मेडम डालना ही क्यों‘ ? ‘अरे दो साल पुराना अचार है दवाई की तरह हो गया है । फिर आपको जो बोर-भाजी (सूखे बेह और सूखी मैथी की भाजी) की दाल पसन्द है ना, उसमें उबलती दाल में सूखा आम का अचार डालती हूँ तभी तो बोर-भाजी का स्वाद उठकर आता है ।‘खोने की थाली में भरवाँ करेले थे । भरवाँ करेला इनकी खास पसन्द है ।‘वाह ! क्या करेला बना है ? फाईव स्टार वाला पाँच हजार रुपये में भी ऐसे करेले की सब्जी सर्व नहीं कर सकता ।‘ इन्होंने एक करेला और थाली में डाला । कूटी तिल्ली खोपरे के सूखे मसाले में अचार का तेल डालकर करेले भरे हैं, तभी तो कड़वाहट कम हो गयी है ।‘ मैंने उत्साही होकर बताया ।‘तो आजकल अचार यूँ नहीं तो यूँ जा रहा है पेट में क्यों ? तभी तो तुम्हारा बी.पी. घटता नही । ‘एक चम्मच तेल यूँ भी डलता ही करेले में ।‘ मैंने सफाई दी ।खाने से निपट कर मैंने अचार की दूसरी बरनी देखी । एकदम ताजा जैसा का वैसा ही था, सो थोड़ा सा हिलाकर वापस रख दिया, इस बार अचार नहीं डालूंगी सोचकर ।पन्द्रह दिनों के बाद ही एक बारिश हो गयी थी । एक दिन सब्जी मण्डी गयी तो पूरे मार्केट में सब्जी से ज्यादा अचार की केरी दिखाई दी । मैं लूँ न लूं की पेशोपेश में पड़ी और फिर बगैर लिए ही घर आ गई । उस रात सपने में मुझे पिताजी दिखे । मकड़ी का जाला झाडू में लपेट कर निकालते हुए । याद आया ऐसे ही एक बार एक बड़ा सा जाला छत पर पँखे के पास लटक रहा था और मकड़ी लगातार अपने हाथ-पैर चला रही थी । पिताजी ने मकड़ी दिखाते हुए कहा था ‘तुम्हारी माँ भी मकड़ी जैसी है सारा दिन इस गृहस्थी के जाल में हाथ-पैर चलाती उलझी रहती है ।‘ मेरी नींद खुल गयी थी । मैं खुश थी आज बरसों बाद बाबूजी यूँ दिखे, वरना हम सब चाहते थे कि वे दिखें पर कभी किसी को सपने में भी नहीं दिखे थे । मैं उठकर बैठ गयी । बाबूजी के जाने के बाद पाँच सालों से घर यूँ ही बन्द पड़ा है । माँ छोटी बहन के पास है । एक पल को लगा कि बाबूजी की आत्मा शायद अपनी गृहस्थी की उपेक्षा की तरफ हमारा ध्यानाकर्षण कर रही है कि देखो यहाँ कभी बगिया में फूल खिलते थे, मंदिर में दिया जलता था, तरह-तरह के पकवान बनते थे, अचार और मुरब्बे डलते थे । धूप में सुखते-
कूटते मसालों की सुगन्ध होती थी और तुम्हारी माँ मकड़ी की तरह इन महीन जालों में उलझी रहती थी । धूप में तप कर अन्दर आती तो चेहरा लाल हो जाता था । प्याज काटती तो आँखें धुली-धुली स्वच्छ लगती थी । मसाले कूटते उसके हाथों की नसें जैसे तानपूरे के तार की तरह झंकृत होती दिखती थी । इन सब से उसे दूर कर तुमने उसके चेहरे के रंग, उसके हावभाव, उसकी आँखों का पानी सब सुखा दिया है । मकड़ी को उसके जाले में ही हाथ-पैर चलाना आता है यह कहते हुए । मुझे याद आया बाबूजी जाला बनाती मकड़ी को कभी नहीं मारते थे । कहते थे ‘जाला जब सूखा हो जाए, मकड़ी निकल जाए तब हटाना चाहिए । तब समझ में नहीं आता था कि इसका क्या अर्थ है, पर आज स्वतः समझ में आ गया । घर संसार सबका स्वप्न है, लक्ष्य होता है जीने का, उसे पूरा करने देना चाहिए या तो पहले ही सफाई रखो कि जाले बने ही ना, नहीं तो पूरा होने के बाद सूखने दो तब हटाना । जाने क्यूँ लगा कि पिताजी चाहते हैं हम माँ की इच्छा अनुसार कुछ दिन बन्द घर को फिर चालू करें, माँ में प्राणों का संचार करने के लिए । मैंने और छोटी ने आठ दस दिन का प्रोग्राम बनाया माँ के साथ घर जाने का । पिताजी की बात (सपनो वाली) किसी से नहीं की । इस बात को सबने अपने-अपने ढंग से सोचा किसी ने कहा पता नहीं एकदम क्या सूझी । ‘प्रापर्टी का मामला होगा बँटवारे के लिए माँ को यहाँ लायी हैं । कुछ हाथ लग जाए शायद इसीलिए घर खोला होगा वगैरह-वगैरह‘ .......................पाँच सालों में घर ‘घर‘ बचा ही नहीं था । एक बन्द मकान था, जिसमें मकड़ी के अलावा चूहे, छछून्दर, सबने घर बना लिए थे । सब कुछ वैसा ही जमा था, अपने बेजान शरीर के साथ, बेरौनक सा ।छोटी तो जैसे रोने ही लगी थी ‘क्या ये हमारा ही घर है ।‘ तो कहाँ गए वे दिन ----?‘ मैं बोलने की स्थिति में ही नहीं थी और माँ को तो काका के घर ही छोड़ आयी थी जानबूझ कर कि पहले जाले हटाकर अन्दर प्रवेश की जगह तो बना दूँ । पता नहीं माँ अपनी उजड़ी गृहस्थी को देख जीवन से जुड़ेगी या टूटेगी ?यह हमारा ही घर था, कभी एक मंजिला, बाहर लॉन, चारों तरफ फूलों के पौधे, पीछे किचन गार्डन, बरामदे में एक बड़ा सा झूला पालकी वाला, दरवाजे पर बंधनवार बनाती लटकती चमेली । दरख्तों के बीच यह इमारत एक छोटी हवेली लगती थी । ‘आदमी ना रहने की वजह से एकदम विरान लगती है नई जगह मेडम‘ ड्रायवर अनवर की बात से मेरी तन्द्रा भंग हुई । मैंने कहा लो अब विराना दूर करते हैं ।
मैंने दरवाजे पर लगी कालवेल दबाई थोड़ा जाम हो रहा था स्वीच । एक बार फिर दबाई ‘घण्टी ने एक नन्हे पंछी जैसी आवाज निकाली टिन टिन टिन .......... मैंने एक बार फिर दबाई, एक बार फिर ‘शाँट सर्किट हो जायगा मेडम‘ अनवर ने टोका । ‘जानते हो अनवर जब तक बाबूजी दरवाजा नहीं खोलते थे मैं लगातार बजाती थी बेल ।‘ यादों के बादल बेमौसम, घुमड़ आते हैं और मन को गीला कर जाते हैं । अनवर ने हमारी मदद की मैं, छोटी, काकी की महरी, चौकीदार और एक लेबर हम सब ने पाँच साल से बन्द घर को पाँच घण्टे में इस लायक तो कर लिया कि अन्दर बैठा जा सके । बिजली और पानी का शुल्क माँ एक साथ चौकीदार को भेज रही थी सो मुश्किल नहीं हुई दोनों ने थोड़ी सी जाम मशीनरी को चालू करते ही हमारे लिए हथियार का काम किया । वाशिंग मशीन, फ्रीज सब के तार अनवर ने बदल दिए, फ्यूज बल्ब बदले गए, बिस्तर की पेटी से नए परदे, नया कार्पेट, नयी चादरें सब निकल आए । छोटी ने धोबी का गठ्ठर बाँधा, कल देंगे सब । गैस कनेक्शन लगाया, आश्चर्य हुआ पाँच साल से बन्द घर की टंकी भरी हुई थी । काकी ने घर से दूध लाकर उफना दिया, फिर बनी चाय और तब शाम को अनवर माँ को गाड़ी में बिठा लाया, शाम का दिया बत्ती हुआ । बन्द घर की सीलनवाली गन्ध को धूपबत्ती ने कुछ कम किया । फिर हम लाईट जलती छोड़, पँखे चलाकर, घर की खिड़कियाँ खोल, रात के खाने और सोने के लिए काका के घर आ गए । अगले दिन लंच के बाद घर मिशन फिर चालू हुआ । पिताजी की डायरी से किरानेवाले, दूधवाले, प्रेसवाले सबके नम्बर मिले । मोबाइल था ही सो घर बैठे सब आ गया । शाम का खाना हमने यहीं बनाया । अनवर कहीं गया था, लौटा तो उसके लिए सब्जी कम थी । माँ ने कहा ‘रुक कुछ बना देती हूँ ।‘‘नहीं-नहीं आप तो अचार दे दो ।‘‘अचार ..............।‘माँ पलट आयीं । मैं समझ गयी थी ‘अचार‘ माँ की यादों का अनमोल रत्न है वे
जरुर दुखी हो गयी हैं । छोटी ने आकर बताया माँ लकड़ी की अलमारी खोलकर अचार की खाली बर्नियाँ देख रही हैं । सामनेवाली जैन की दुकान से चौकीदार ने रेडीमेड अचार ला दिया था छोटी के कहने पर ।रात हम सब अपने ही घर में सोए । बाबूजी वाले कमरे में मैं, छोटी, माँ और काकी ।
अनवर ने छत पर पलंग रख लिया । चौकीदार भी वहीं सोता है । सुबह चाय बनी, पौधों में पानी डला । माँ ने पूजा की, मरती मुरझाती तुलसी के पत्तों में भी जान आयी । काकी ने नल की टपकन के पास ही गमला रख दिया था । आज सबका खाना यहीं बनना था काका, बुआ और हम सब का । आम का रस और पूरी । माँ ने ‘कहा पूरी मैं बनाऊंगी ।‘ छोटी ने डपटा, इत्ते लोगी की है दस मिनट में तुम्हारा घुटना टें बोल जाता है आधा पौना घण्टा खड़ी रहोगी ?‘
‘करने तो दे जब तक बनेगा बनाने दे, बाद में तू उतार देना ।‘ पर यह चमत्कार था या माँ का लौटा हुआ आत्मविश्वास, ना आटा सानते माँ का हाथ कंपकंपाया ना घुटने ने टें बोली बल्कि वह चकला बेलन, छोटे बर्तन भी खड़े-खड़े धो लाई ।मुझे याद आया कल पिछवाड़े गई थी तो दो कबीट पड़े थे पेड़ के नीचे, उठा लाई थी । उनको फोड़ा तो आँगन के मचान पर लगा बाबूजी कबीट की चटनी कूच रहे हैं । मैंने ख्ररड़ और सीलबट्टा साफ किया, खूब गुड़ डाल कर कबीट के बीजों को कूचना शुरु किया तो लगा बाबूजी पास खड़े हैं बिट्टू कबीट के बीजों को पहले कूच-कूच कर फिर गुड़ के साथ सीलबट्टे पर रगड़ा लसर-लसर ऐसी खट्टी-मिठ्ठी चटनी बनती है कि खाने वाला ऊंगलियाँ चाटता रह जाए, लो चखो मेरा हाथ स्वतः ही दूसरी हथेली पर लाल चटनी रख गया और मैंने आँखें मूंद कर चटनी का स्वाद लिया । ‘बिल्कुल बाबूजी जैसी ।‘ माँ मुझे चटनी पिसते चार बार देख गई कभी ‘जरा सा जीरा डाल तेरे बाबूजी डलवाते थे‘ कह कर तो कभी काला नमक डलवा कर ओगुण नहीं करेगी कह कर । सब जैसे भूल गए थे कबीट की चटनी भी बनती है ।
अगले दिन सारे अचार के मर्तबान माँ ने महरी से धुलवाए यह कह कर तुम बहनें ले जाओ, यहाँ तो खाली पड़े हैं ।‘मैंने बाजार से कच्चे आम मँगवाए । अचार के मसाले बाबूजी की डायरी अनुसार ही आए । केरी काटने का सरोता चमकाया गया । माँ परेशान होने लगी कौन काटेगा केरी
और कौन कूटेगा मसाले ।‘ रेडीमेड मसाला ले आती बिट्टू ? कैरियाँ काटने का जिम्मा मेरा था और मसाले कूटने का छोटी का । पुरानी सूती साड़ी बिछायी गयी धोकर कच्ची कैरियाँ माँ ने छाँटी । जैसे ही पहली कैरी सरोते पर रखी, याद आया बाबूजी ने कहा था‘ कैरी हमेशा खड़ी चीरना चाहिए, फाँक अच्छी बनती है ।‘ एक फाँक काटने में हाथ दुखा फिर लगा जैसे बचपन में बाबूजी हथ्था पकड़वा कर दबवाते थे और खच्च करके कैरी कट गयी फिर तो ट्रिक हाथ लग गयी और गीले खोपरे की तरह सब केरी कट गयी । छोटी ने सारे मसाले वैसे ही कूटे, माँ आश्चर्यचकित थी एकदम वैसी ही फाँक और हर मसाला सही अनुपात में कैसे किया रे छोरियो ? वह तेल गरम कर लायी और मसाले भूनते हुए बोली ‘मैं कहाँ डालती थी अचार, सब वो ही तो डलवाते थे दरअसाल नाम मेरा होता था लोग यह ना कहें कि व्यासजी अचार डालते हैं पर सच ये है बिट्टू मसालों का सारा अनुपात उन्हीं का होता था । ‘अचार डला, मर्तबान को भी पुर्नजीवन मिला, अलमारी में खुशबू फैली ।कटोरी भर कर शाम की रसोई में सर्व हुआ पर किसी का ब्लडप्रेशर नहीं बढ़ा । छोटी के पति ट्रेनिंग पर गए थे लौटते में यहीं आने वाले थे दस दिन माँ और रह सकती थी घर पर । ‘मैं दस दिन बाद आती हूँ‘ इसी वादे के साथ अपने घर आ गयी । गाड़ी से उतरी तो हाथ में अचार की बर्नी देख पति ने टोका ‘फिर अचार डाल लायी वो भी इतना ?‘मैंने गर्व और श्रृद्धा से कहा ‘ये अचार नहीं है ये बाबूजी को श्रद्धांजलि है, ये हर साल डलेगा ।‘
डा. स्वाति तिवारी
ईएन-१/९, चार इमली
भोपाल

Tuesday, February 2, 2010

ना मे नी बोलना

जब भी सोंचती हूँ
अब मेँ चूप रहूंगी ,
तब
मन की चंचलता हिलोले ल्रती है
आदतों का बचपना पुकारने लगता है
आशाओं का स्वप्न संवरने लगता है
भावनाओं का ज्वार उफनने लगता है
आखों का जल छलकने लगता है
और तब ,
ना चाहते हुए भी
एक कंपकंपातीआवाज
निकल जाती है
और मै फिर बोलने लगती हूँ

जीवन की तीन

बचपन की मेरी महत्वाकांक्षाएं
बगुले के पंखों सी उज्जवल ,
सुबह की कच्ची धूप सी रुपहली
और,
मासूम कलि सी कोमल थी
जो,
सागर सी गहरी
आकाश सी अनंत
धरा सी धेर्यवान
और ,पंछी सी नादाँ थी
योवन की मेरी महत्वाकांक्षाएं
जो, दोपहर की धूप सी ज्वलंत हें
आकाश सी बिना छोरवाली
शितिज सी सुन्दर पर
मृगमरीचिका सी मिथ्या है
समाज के राक्षसी पंजों में फंसी
मुरझाई जीवन मूल्यों से संघर्ष करती
कली की तरह है ,और
आगे मेरी वृद्धा होती महत्वाकांक्षाएं
जो
होगीं सांज की ढलती कलासयी
धूप सी निस्तेज
सागर की गहराई से निकल
आकाश में उड़ी और ,
धरा पर गिरने वाली
पानी की नन्ही बूंदों सी
जो स्पर्श पाते ही
बिखर जाती है

















नव निर्माण

एक विशाल जंगल
जंगल में एक बरगद का पेड़
पेड़ पर सुन्दर सा घोंसला
घोंसले में बसा पक्षी का संसार
तेज हवा का झोंका आया
और ,
सुन्दर घोंसला हो गया तितर-बितर
पक्षी की अल्हड़ता का हुआ अंत
बिखरे घोंसले को देख कर
नन्हा पक्षी चिंतित था अब ,
नव निर्माण के लिए


Monday, February 1, 2010

जीवन उत्सव

ऐसे भी पल आये जीवन में
अखिंयाँ रह गयी ठगी ठगी
मन अचरज से भर आया
तन लहराया गंध -सुगंध सा
जीवन उत्सव कहलाया
ऐसे भी पल आये जीवन में
मन उपवन -सा महकाया
दीप्त शिखा का उज्जवल
एक स्वप्न -सा उभर आया
मुक्त का सीपी से हो बंधन
ऐसा ही बंधन बंध आया

ऐसे भी पल आये जीवन में
हाथ जोड़ साथं माँगा था तुमने
पल दो पल का और हम?
हम जीवन ही अर्पित कर आये
अपनी एक ख्वाबों की दुनिया
दो गज जमीं में दफना आये
ऐसे भी पल आये जीवन में
आँगन गुंजन युक्त हुआ
हिंडोले अम्बुआ की डाली
सुर्ख चम्पई सांजशरमाई
हाथों में मेहँदी रच आई
ऐसे भी पल आये जीवन में
जीवन उत्सव कहलाया