Sunday, January 31, 2010
Friday, January 29, 2010
अक्सर हम भी बुन लेते हैं
संकल्पों के जाले,
ठीक उस मकड़ी की तरह
जो घर का सपना देखती
उलझ जाती है ,स्वयं के बुने जालों में
हमारे स्वप्नों के ये जाल
महीन तारों से बुने होते है ,चटक रंगों ,रेशमी तारों के वावजूद
,जकडन की चिपचिपाहट
फंस जाने की उकताहट से
मुक्त होनेकी छात्पताहत में ,
हम
एक जाले से निकलते हुए
दूसरा जला बुनने लगते है
जाल दर जाल
बुनने और निकलने की उलछन में
हम और उलझते जाते है
अपने ही बुने मकड जालों में अपने ही मकड जालों में
संकल्पों के जाले,
ठीक उस मकड़ी की तरह
जो घर का सपना देखती
उलझ जाती है ,स्वयं के बुने जालों में
हमारे स्वप्नों के ये जाल
महीन तारों से बुने होते है ,चटक रंगों ,रेशमी तारों के वावजूद
,जकडन की चिपचिपाहट
फंस जाने की उकताहट से
मुक्त होनेकी छात्पताहत में ,
हम
एक जाले से निकलते हुए
दूसरा जला बुनने लगते है
जाल दर जाल
बुनने और निकलने की उलछन में
हम और उलझते जाते है
अपने ही बुने मकड जालों में अपने ही मकड जालों में
Wednesday, January 27, 2010
15 वां नक्षत्र
स्वाति नक्षत्र आकाश मंडल का 15 वां नक्षत्र हे जिसका स्वामी राहू हे ? बूंद जो बनजाती मोती वही तो हे स्वाति
में स्वाति शब्दों के मोती रचना चाहती हूँ .
विचारों की सीपियाँ तो अंतस में खुलती बंद होती ही रहती हें जाने कब कोई शब्द अनमोल मोती बनजाये.क्या शब्दों से अनमोल कुछ हे ?शब्दों के हीरे जवाहरात दिल के बंद कपाट खोल देते हे.महलों के खजाने खोल सकते हे.जीने की रह बदल देते हे जाने कितने मुरझाते कानों में अमृत गोल देते हें .ये शब्दों की अक्षत हम संजोयेंगे ये विश्वास हे मेरा .
स्वाति एक नक्षत्र हे जिसकी बूंदें सिप में गिरकर अनमोल मोती बनती हें .नक्षत्र जिसके लिए चातक पक्षी वर्षभर प्यासा रहता हे स्वाति नक्षत्र की बुँदे उसके लिए अम्रत बनती हे .जिसकी बुँदे कदली के पत्तों पर गिरकर कपूर बन उड़ जाती हे .एक नक्षत्र जिसकी बूंदें शेष नाग के मुंह में गिरजाये तो जहर बनती हे .स्वाति एक नक्षत्री बादल .स्वाति अनमोल मोती का सृजक .पपीहे की प्यास .पत्ती.. पे ओस की रुकिहुई बूंद .शेषनाग का अलंकार .
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